द्वापर युग में कबीर परमेश्वर की दया से पांडवों का अश्वमेध यज्ञ संपन्न हुआ । कबीर परमात्मा ने अपने शिष्य सुपच सुदर्शन के रूप में आकर पांडवों के यज्ञ को संपन्न किया ।
कबीर परमात्मा चारों युगों में आते हैं सतयुग में सत सुकृत नाम से, त्रेता में मुनेंद्र नाम से, द्वापर में करुणामय नाम से और कलयुग में अपने असली नाम कबीर नाम से प्रगट होते हैं ।
कबीर साहेब जयंती बनाम कबीर प्रकट दिवस कबीर साहेब जी ने अपनी वाणी में स्पष्ट किया है कि उनका जन्म नहीं होता :- ना मेरा जन्म ना गर्भ बसेरा, बालक बंद कराया । काशीनगर जल कमल पर डेरा, जहां जुलाई ने पाया ।। मात-पिता मेरे कुछ नाही, ना मेरे घर दासी । दुल्हे का सुत आन कहाया, जगत करें मेरी हंसी ।। उन अवतारों की जयंती मनाई जाती है जो माता से जन्म लेते हैं और जो स्वयं प्रकट होते हैं, उनका प्रकट दिवस मनाया जाता है। परमात्मा कबीर जी चारों युगों में एक शिशु के रूप में प्रकट होते हैं। कलियुग में, वह सन् 1398 में काशी के लाहारातारा तालाब में एक बच्चे के रूप में दिखाई दिए, जिसके ऋषि अष्टानंदजी साक्षी बना। इसलिए कबीर साहेब का प्रकट दिवस मनाया जाता है। कबीर, ना मेरा जन्म न गर्भ बसेरा, बालक बन दखलाया। काशी नगर जल कमल पर डेरा, तहां जुलाहे न पायि ।।
आज का मानव गलत भक्ति साधना करके नास्तिकता की तरफ बढ़ता जा रहा है मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारों या चरच में जाकर पत्थर पूजा करता है या कहीं झूठे गुरुवों के जाल में जाकर फस जाता है अज्ञानी गुरु उनको फंसा देते हैं जिस कारण से उन्हें कोई लाभ नहीं प्राप्त होता है । अज्ञानी झूठे घरों के पास न कोई आध्यात्मिक ज्ञान है न कोई भक्ति विधि है और न उनकी कोई मर्यादा है वह खुद भी नरक को प्राप्त होते हैं और अपने शिष्यों को भी नरक में धकेल देते हैं । ऐसे अज्ञानी संतो से बचें और तत्वदर्शी संत की खोज करके उनकी शरण में जाएं और अपना मोक्ष करवाएं और इस जन्म मरण रूपी दीर्घ रोग से छुटकारा पाएं । परमात्मा कबीर साहेब जी ने कहा है कि :-- कबीर, क्या कहूं कुछ थीर न रहाई, देखत नैन चला जग जाई । एक लख पूत सवा लख नाती, उस रावण के दीवान बाती ।। यहां परमात्मा ने कहा है कि रावण जैसा धनवान योद्धा जिसके एक लाख पुत्र संतान रूप में थे और सवा लाख उसके भाई-बंधु (न्याती) थे लेकिन सत भक्ति न करने से सारा नष्ट हो गया कोई दीपक जलाने वाला भी नहीं बचा । अध्यात्म ज्ञान...
दीवाली की अंधेरी रात को, अज्ञान, लोभ, ईर्ष्या, कामना, क्रोध, अहंकार और आलस्य के अंधकार को दूर किया जा सके, तथा ज्ञान, विवेक और मित्रता की चमक लाई जा सके।
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